Friday, 18 May 2012

मैं जिंदा यहाँ हूँ

गिरा हूँ मैं उठ कर, मैं गिर कर उठा हूँ  !
इसीलिए तो यारों मैं जिंदा यहाँ हूँ  !
रास्ते हैं ही कम, उनमें पत्थर बहुत हैं  !
उन्ही से तो ठोकर मैं खाया यहाँ हूँ  !!

हँसते हो तुम, पर मैं रोता यहाँ हूँ  !
लड़ते हो तुम, पर मैं सहता यहाँ हूँ  ! 
फूल हैं कम, यहाँ कांटे बहुत हैं  !
उन्ही से तो ज़ख़्मी में हुआ यहाँ हूँ  !!

मत सुनो तुम, पर मैं सुनता सारा जहाँ हूँ  !
जिसे कोई ना समझे, उसे में समझता हूँ  !
देखा है मैंने, लोग रोते बहुत हैं ! 
उन्ही को तो चुप मैं करता यहाँ हूँ  !!

ना देखा किसी ने, मैं रहता वहां हूँ  !
उसी को बताने, मैं कहता यहाँ हूँ  !
इसी को दिखाने, मैं लिखता यहाँ हूँ  !
इसीलिए तो यारो मैं जिंदा यहाँ हूँ  !!

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